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maternal grandmother and memories of childhood

नानी नहीं रहीं. पिछले साल की बात है. तब हर गली-नुकक्ड़ पर नोटबंदी की चर्चा थी. मेरे पास पैसे नहीं हैं, ये कहने में किसी को झेंप नहीं होती है क्योंकि लगभग हर किसी के पास पैसे नहीं थे. मैं उस वक्त एटीएम की कतार में खड़ी अपनी बारी का इंतजार कर रही थी. दूध-सब्जी के लिए बेटी का गुल्लक भी तोड़ा जा चुका था. खुले पैसे चाहिए ही थे. फोन आया- नानी गुज़र गईं. मैंने सुना और कतार में रही.

लाइन सरक रही थी. बीच-बीच में जोर से रो-पड़ने को होती, फिर पलकें झपकाकर कंट्रोल कर लेती.

नानी के साथ मेरे बचपन का लंबा हिस्सा बीता, अब कभी उनके गुलगुले गाल और झुर्रीदार हाथों को छू नहीं सकूंगी. अब कोई अपनी कहानी के अंत में मुझे नहीं कहेगा- ‘जैसे उसके दिन बदले, वैसे सबके दिन बदलेंगे’. अब कोई किसी त्यौहार-बार पर अपनी मधुबनी पेंटिंग से मुझे मुग्ध नहीं कर देगा.

गोबर, हल्दी, चावल का पानी, काली मिट्टी, पीली मिट्टी, भीगी रेत, चूना… मेरी नानी किसी भी चीज से पेंटिंग कर पाती थीं.

बचपन को याद करें तो लगभग हम सबका बचपन नानी की यादों से समृद्ध रहा है. तब हम यही कोई छह बरस के रहे होंगे! नानी की रसोई दुनिया के किसी भी शेफ की रसोई से ज्यादा संभावनाएं लिए हुए थी. नानी की कहानियों ने हमें खाट पर लेटे हुए ही सारी दुनिया की सैर कराई. दो बहनों की कहानी, जिसमें अच्छी बहन को सारा जहां मिलता है… राक्षस की कहानी, जिसमें छोटा बच्चा अपनी चतुराई से गांववालों की जान बचाता है… तब सिर्फ सुनने में मजा आता. अब हम जानते हैं कि हम सबका एक बड़ा हिस्सा इस किस्सागोई से बना है.

छोटी थी तो मैं किसी फल का छिलका नहीं खा पाती थी. नानी हंसिया लेकर बैठतीं और मैं आलथी-पालथी लगाकर पास सरक आती. वो एक बार में बिना हाथ उठाए सेब छील देतीं. मुझे सेब खाना कभी अच्छा नहीं लगा लेकिन छीलना देखने के लिए मैं पूरे मौसम खाती.

उनके पास एक चीकट-सा संदूक था. हर साल किसी एक वक्त वो खुलता और हम सारे ममेरे-मौसेरे भाई-बहन जमा हो जाते. उसमें रखी हर चीज का इतिहास था. ये वाली साड़ी, उसने, उस मौके पर दी थी. ये हरी चूड़िया तेरी मां से भी पुरानी हैं. संदूकची में एक पीली सी धोती की पोटली पड़ी रहती थी. नानी उसे लेकर हमेशा भावुक हो जातीं. ये उन्हें उनकी मां ने शादी के बाद विदाई में दी थी.

पोटली में क्या था? एक बार मेरे बहुत जिद करने पर नानी ने पोटली खोली- पीले चावल के टूटे-फूटे दाने और पांच पैसे का ऐतिहासिक सिक्का. बाद में मेरी शादी पर भी मेरी मां ने मुझे ऐसी ही पोटली दी. वो मेरे सूटकेस में है. ठीक नानी की तरह.

ननिहाल बचपन का वो हिस्सा है, जिसमें धूप-छांव एक साथ सुस्ताते हैं. यही वो घर है, जहां का इतिहास हमारे वर्तमान से बहुत बड़ा होने के बावजूद उसे लील नहीं जाता, बल्कि भविष्य देता है.

ब्रिटिश साइकोएनालिस्ट डोनॉल्ड विनिकॉट नानी को ‘ट्रांजिशनल ऑब्जेक्ट’ कहते हैं. यानी वो सिरा जो सहज ही आपको दूसरे संसार से जोड़ता है.

याद करें, जब आप छोटे थे और किसी अनजान से मिलने पर रो पड़ते थे, तब नानी ही थीं, जो पास-पड़ोस में मुलाकात के नाम पर आपको दुनिया से मिलवातीं. मुझे याद है, नानी के रहते मैंने सारे शुरुआती प्रयोग किए, पड़ोसी लड़के का सिर फोड़ने से लेकर पानी की टंकी में नोट डालने तक सबकुछ.

नानी मेरी ढाल थीं, बचने के लिए नहीं लेकिन बेखौफ होकर मनचाहा करने की. सजा तो फिर भी मिली.

नानी और नाती-नातिन का जोड़ अनोखा होता है. एक चेहरा वक्त के साथ झुर्रीदार हो रहा होता है तो दूसरा चेहरा आकार ले रहा होता है. नानियां जानती हैं कि जब तक हम बड़े होंगे, वे नहीं रहेंगी. वे हमसे कभी नई तकनीक पर बात नहीं करतीं लेकिन पूरी दिलचस्पी लेती हैं अगर हम बताएं कि आज हम बारिश के पानी से भरे गड्ढे में कूदे.

जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, नानी से दूर होते जाते हैं. क्योंकि नानी का प्यार बिना शर्त है इसलिए हम उसपर यकीन नहीं कर पाते.

हमारे पेरेंट्स चाहते हैं कि हम बड़े आदमी बनें. प्रेमी या प्रेमिका चाहते हैं कि हम उन्हें समझें, हमारा आसपास चाहता है कि हम अपने फर्ज पूरे करें, लेकिन नानी कुछ नहीं चाहतीं. वो चाहती हैं कि हम हमेशा खुश रहें. हम वैज्ञानिक हैं और मछुआरे के साथ जिंदगी बिताना चाहें तो सिर्फ नानी हमारे फैसले के साथ होगीं.

कोई हैरानी नहीं कि क्यों ‘बचपन’ सुनते ही हम नानी को सोचने लगते हैं.

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